मानवता का प्याला


नील गगन में बन कर उड़ता रहा हूँ, में प्यासा पंछी |
नील गगन में  ढुंढता रहा हूँ ,  मानवता का प्याला ||


नील गगन में बन कर उड़ता रहा हूँ, में प्यासा पंछी |
में ढुंढता रहा हूँ, नील गगन में, सुहाने जीवन का पैगाम ||

नील गगन में बन कर उड़ता रहा हूँ, में प्यासा पंछी |
नील गगन में हूँ, में प्यासा पंछी ||
नील गगन में हूँ, में प्यासा |
कब मिटेगी  प्यास मेरी ||


नील गगन में बन कर उड़ता रहा हूँ, में प्यासा पंछी |
नील गगन में सपना मैंने ||
 ईश्वर की दुनिया में  इसांनियत  का झरना होगा |
प्रेम रूपी नदी बहेगी,बह-बह कर बनेगी मानवता का सागर ||


नील गगन में बन कर उड़ता रहा हूँ, में प्यासा पंछी |
टुटा सपना मेरा ,नील गगन से ||

दुनिया के कठोर धरातल पर खड़ा |
मुझे इस पर ही जीना हैं,परिस्थियी से लड़ना हैं. ||

नील  गगन में पंछी बन कर उड़ना एक भटकाव हैं.
मुझे मानवता  को अपने में  ढुढना हैं.  

अपनी प्यास को वास्तविकता  से बुझाना हैं.

(श्रीयुत देवी सिंह  चौहान जी (सचिव दिल्ली बधिर संध एवम सेवानिर्वत आधिकारी दिल्ली नगर निगम ) के कहने पर में यह कविता दे रहा हूँ. में यह कविता "मानवता का प्याला "  को    भोपाल में   २१ जुलाई १९९३  को लिखा ता, उस समय में   का छात्र था, )

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